आरई–2 पर ‘कार्रवाई का तमाशा’? हाईकोर्ट के आदेश भी बेअसर, 27 मकानों पर फिर तारीख—शहर जाम में, सिस्टम आराम में



इंदौर। एमआर–10 से एमआर–9 को जोड़ने वाली बहुप्रतीक्षित आरई–2 सड़क एक बार फिर सुर्खियों में है, लेकिन वजह निर्माण की प्रगति नहीं बल्कि प्रशासन की वही पुरानी हिचक और “तारीख पर तारीख” की नीति है। पटेल नगर–दाउदी नगर के जिन 27 मकानों को वर्षों से इस परियोजना की सबसे बड़ी बाधा बताया जा रहा है, वे आज भी जस के तस खड़े हैं। कागज़ों में कार्रवाई, ज़मीन पर सिर्फ ड्रामा—आज फिर यही साबित हुआ।


आरई–2 को शहर की ट्रैफिक समस्या का स्थायी समाधान माना जाता है। यह सड़क एमआर 10 क्षेत्र को सीधे एमआर–9 से जोड़ती है, जिससे बायपास, खजराना और आसपास के इलाकों पर यातायात का दबाव कम होना तय है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि सिर्फ 27 मकानों के चलते यह महत्वपूर्ण परियोजना सालों से अधर में लटकी है और इंदौरवासी रोज़ जाम की सज़ा भुगत रहे हैं।


सबसे बड़ा सवाल यह है कि लगभग तीन महीने पहले उच्च न्यायालय द्वारा 7 दिन में समाधान के स्पष्ट आदेश के बावजूद न तो नगर निगम प्रशासन निर्णायक कदम उठा पाया, न ही इंदौर विकास प्राधिकरण (आईडीए) ज़मीन पर प्रभावी रूप से नजर आया। अदालत के आदेश के बाद उम्मीद जगी थी कि अब सिस्टम हरकत में आएगा, लेकिन हुआ इसके ठीक उलट।


आज तड़के नगर निगम का अमला जेसीबी और पोकलेन मशीनों के साथ मौके पर पहुंचा जरूर, लेकिन प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार काफी देर तक कोई ठोस कार्रवाई शुरू ही नहीं हुई। जिन वरिष्ठ और जिम्मेदार अधिकारियों को मौके पर मौजूद रहना था, वे नदारद रहे। नतीजा—फिर वही पुराना फार्मूला अपनाया गया और 5 दिन की नई मोहलत दे दी गई।


स्थानीय नागरिकों और जानकारों का आरोप है कि यह पूरा घटनाक्रम महज “कार्रवाई का दिखावा” है। सवाल उठ रहे हैं कि जब हाईकोर्ट का आदेश भी निगम और प्राधिकरण को मजबूर नहीं कर पा रहा, तो आम जनता की परेशानी किसे दिखेगी? आरोप यह भी हैं कि 27 मकानों के पीछे छिपा वोट बैंक का डर ही प्रशासन को निर्णायक कदम उठाने से रोक रहा है। सत्ता और सिस्टम, दोनों शहर के हित से ज्यादा राजनीतिक समीकरण साधने में लगे दिखाई दे रहे हैं।


शहरवासियों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है। उनका कहना है कि एक तरफ इंदौर ट्रैफिक से बेहाल है, दूसरी तरफ निगम और प्राधिकरण की आपसी खींचतान और टालमटोल नीति समझ से परे है। हर बार भारी मशीनरी के साथ “बड़ा हमला” दिखाया जाता है, फिर कुछ घंटों बाद बिना नतीजे के अमला लौट जाता है। यही सिलसिला कब तक चलेगा?


अब सवाल सीधे-सीधे नगर निगम, जिला प्रशासन और इंदौर विकास प्राधिकरण से है—

क्या आरई–2 पर कार्रवाई सिर्फ कैमरों और फाइलों के लिए होती रहेगी?

क्या हाईकोर्ट के आदेशों का भी यही हश्र होगा?

और कब तक इंदौरवासी ‘जल्द समाधान’ और ‘अगली तारीख’ के जाल में फंसे रहेंगे?


अगर प्रशासन सच में शहर को ट्रैफिक जाम से राहत देना चाहता है, तो उसे वोट बैंक और राजनीतिक दबाव से ऊपर उठकर ठोस और पारदर्शी फैसला लेना होगा। वरना आरई–2 सड़क यूं ही अधूरी रहेगी—और इंदौर हर सुबह जाम में फंसा, सिस्टम से जवाब मांगता रहेगा।

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