सड़क हादसों में 20 मौत प्रति घंटा, इसे रोकना सिर्फ पुलिस की जिम्मेदारी या हमारा नागरिक कर्तव्य



भारत की सड़कों पर आज जो दृश्य दिखाई देता है, वह किसी युद्ध से कम नहीं है। आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, हर घंटे लगभग 20 लोग सड़क दुर्घटनाओं में अपनी जान गंवा देते हैं। यानी हर दिन सैकड़ों घर उजड़ जाते हैं, हर दिन असंख्य सपने बीच रास्ते में दम तोड़ देते हैं। यह संख्या किसी महामारी या सशस्त्र संघर्ष से कम भयावह नहीं है। फिर भी विडंबना यह है कि हम इसे एक सामान्य घटना, एक दुर्भाग्यपूर्ण लेकिन “चलता है” वाली सच्चाई मान चुके हैं। यही हमारी संवेदनहीन स्वीकृति सबसे बड़ी चुनौती है।

इस संकट की जड़ में एक बुनियादी और खतरनाक मानसिक भूल छिपी है। हमने सड़क सुरक्षा को अपना कर्तव्य मानने के बजाय, पूरी तरह पुलिस की जिम्मेदारी मान लिया है। जैसे नियमों का पालन करना हमारी नैतिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पुलिस का दबाव हो। यह सोच न केवल गलत है, बल्कि जानलेवा भी है।

मानसिकता का संकट

हमारी यह मानसिकता अचानक नहीं बनी। बचपन से हम अपने आसपास देखते आए हैं कि हेलमेट “पुलिस हो तो पहन लो”, सीट बेल्ट “हाइवे पर ही जरूरी है”, और लाल बत्ती “देख कर” तोड़ी जाती है। घर के बड़े जब नियमों को सुविधा के हिसाब से तोड़ते हैं, तो वही संस्कार बच्चों के अवचेतन में बैठ जाते हैं। परिणामस्वरूप, यातायात नियम हमें सुरक्षा कवच नहीं, बल्कि बाधा लगने लगते हैं।

यही कारण है कि चौराहे पर पुलिस दिखते ही हम अनुशासित हो जाते हैं, लेकिन पुलिस हटते ही वही सड़क जंगल बन जाती है। हम यह भूल जाते हैं कि लाल बत्ती किसी पुलिसकर्मी को खुश करने के लिए नहीं, बल्कि हमारे और सामने वाले के जीवन की रक्षा के लिए लगाई गई है। नियम तोड़कर हम व्यवस्था को नहीं, सीधे-सीधे जीवन को चुनौती दे रहे होते हैं।

वैश्विक परिप्रेक्ष्य और हमारी भूल

दुनिया के कई विकसित देशों में ट्रैफिक नियंत्रण पुलिस की उपस्थिति पर निर्भर नहीं करता। वहां स्व-अनुशासन, नागरिक जिम्मेदारी और तकनीक का समन्वय होता है। लोग जानते हैं कि नियमों का उल्लंघन केवल जुर्माना नहीं, बल्कि सीधे जीवन के लिए खतरा है। वहाँ सड़कें सुरक्षित इसलिए नहीं हैं कि हर मोड़ पर पुलिस खड़ी है, बल्कि इसलिए कि हर नागरिक अपने व्यवहार को लेकर सजग है।

इसके विपरीत, हमारे यहाँ “पकड़े न जाएँ तो सब ठीक” की मानसिकता हावी है। कैमरे से बचने के रास्ते खोजे जाते हैं, नियमों के पालन को मूर्खता समझा जाता है। यही सोच प्रति घंटे 20 मौतों का कारण बनती है। यह संख्या केवल आँकड़ा नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक असफलता का प्रमाण है।

नियति नहीं, सुधार संभव है

सड़क दुर्घटनाओं को भाग्य का लिखा मान लेना सबसे आसान बहाना है, लेकिन यह सच्चाई से भागने का तरीका भी है। यह कोई दैवीय आपदा नहीं, बल्कि मानव-निर्मित संकट है। और जो संकट मानव ने बनाया है, उसे मानव ही बदल सकता है।

सबसे पहला और आवश्यक कदम है—सोच में बदलाव। हेलमेट चालान से बचने के लिए नहीं, बल्कि अपने परिवार के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए है। सीट बेल्ट कानून का डर नहीं, बल्कि जीवन का सम्मान है।

शिक्षा और संस्कार भी उतने ही जरूरी हैं। सड़क सुरक्षा को पाठ्यक्रम की औपचारिकता न बनाकर, जीवन शैली का हिस्सा बनाना होगा। बच्चों को नियम रटाने से ज्यादा जरूरी है, उन्हें नियमों का महत्व व्यवहार में दिखाना।

सामूहिक जिम्मेदारी के बिना कोई सुधार संभव नहीं। जब तक हम सड़क सुरक्षा को केवल पुलिस का “सिरदर्द” समझते रहेंगे, तब तक हादसे थमने वाले नहीं हैं। पुलिस व्यवस्था लागू कर सकती है, लेकिन संस्कार केवल समाज ही बना सकता है।

और अंत में

सड़क सुरक्षा केवल नियमों का पालन नहीं, बल्कि जीवन के प्रति हमारी संवेदना और जिम्मेदारी का पैमाना है। जिस दिन हम अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद उठाना सीख लेंगे, उसी दिन सड़कों पर बहता खून रुकना शुरू होगा। याद रखिए, पुलिस हर मोड़ पर आपकी जान बचाने के लिए खड़ी नहीं हो सकती, लेकिन आपकी समझदारी, आपका विवेक और आपका अनुशासन हर सफर में आपके साथ चल सकता है।

राजकुमार जैन, यातायात प्रबंधन विशेषज्ञ

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