इंदौर की सड़कों पर मौत का तमाशा जो रोजाना हो रहा है, उसे अब हादसा नहीं कहा जा सकता। यह एक निरंतर घट रही त्रासदी है, जिसके जिम्मेदार कोई बाहरी तत्व नहीं, हम स्वयं हैं। हादसों के बढ़ते आंकड़े किसी चेतावनी की तरह नहीं, बल्कि अभियोग की तरह सामने खड़े हैं।
सिर्फ़ 10 महीनों में 1600 से अधिक सड़क दुर्घटनाएँ। 100 से ज़्यादा मौतें केवल हेलमेट न पहनने के कारण।
ये आंकड़े किसी रिपोर्ट की पंक्तियाँ नहीं, बल्कि उन घरों की कहानी हैं जहाँ अब आवाज़ें नहीं गूंजतीं, उन बच्चों की कहानी हैं जो हर शाम अपनी डबडबाई आंखों से दरवाज़े की ओर ताकते रह जाते हैं, उन महिलाओं की कहानी है जिनकी मांग सूनी पड़ी है, उन माताओं की कहानी है जो सूनी टकटकी बांधे राह तक रही है अपने लाल के घर आने की, उन परिजनों की जिनके आंसू सूख चुके हैं। इसके बावजूद, इंदौर की सड़कों पर आज भी वही दृश्य है, बिना हेलमेट, बिना सीट बेल्ट, लाल बत्ती को चुनौती समझते वाहन, रांग साइड फुल स्पीड भागते वाहन, हर तरफ घुसने को उतारू वाहन चालक और “मुझे कुछ नहीं होगा” की घातक मानसिकता।
इस आपाधापी के बीच सबसे डरावनी बात यह नहीं हैं कि नियम टूट रहे हैं। सबसे डरावनी बात यह है कि नियम तोड़ना सामान्य हो गया है, एक स्वीकृत व्यवहार हो गया है। अब नियम मानने वाला मूर्ख और तोड़ने वाला चतुर समझा जाता है। तेज़ रफ्तार शान बन गई है, और अनुशासन कमजोरी। यही वह मोड़ है जहाँ समाज पतन की ओर मुड़ता है।
यह प्रश्न प्रशासन से नहीं, पहले शहर के नागरिकों से है, क्या हमारी जान इतनी सस्ती है? क्या एक मिनट बचाने के लिए अपना पूरा जीवन दांव पर लगाना स्वीकार्य है?
इंदौर वह शहर है जिसने स्वच्छता में देश को राह दिखाई। लेकिन सड़क पर नागरिकता की परीक्षा में हम लगातार असफल हो रहे हैं। अभियान चले, नियम बदले, चालान कटे, पर नागरिकों का व्यवहार नहीं बदला। तो समस्या कानून की नहीं, संस्कारों की है। भारतीय समाज सोलह संस्कारों की परंपरा पर खड़ा रहा है। आज समय आ गया है कि यातायात नियम पालन को 17वाँ संस्कार माना जाए। डर से नहीं, जुर्माने से नहीं, बल्कि जीवन के प्रति सम्मान से।
चेतावनी स्पष्ट है कि, आज आपने हेलमेट नहीं पहना, तो कल आपकी तस्वीर किसी खबर के नीचे हो सकती है।
आज आपने नियम तोड़ा, तो संभव है किसी और के घर में मातम हो।
हर माता-पिता से सवाल है। आप बच्चों को संस्कार सिखाते हैं, लेकिन सड़क पर नियम तोड़ते हैं। याद रखिए, बच्चे वही सीखते हैं जो वे देखते हैं। संस्कार उपदेश से नहीं, आचरण से बनते हैं।
अब और सहनशीलता आत्मघाती होगी। अब और चुप्पी अपराध में सहभागिता होगी। इंदौर की सड़कों को सुरक्षित बनाना है तो शुरुआत आज से नहीं, अभी से करनी होगी।
अपने लिए नहीं, तो अपनी संतानों के लिए।
यातायात नियम पालन विकल्प नहीं है। यह जीवन है। यह 17वाँ संस्कार है।
राजकुमार जैन, यातायात प्रबन्धन विशेषज्ञ




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