यह भूमि निजी स्वामित्व की है और इस पर स्वामित्व को लेकर न्यायालय में विवाद लंबित है। इतना ही नहीं, माननीय न्यायालय द्वारा इस जमीन पर स्थगन आदेश (Stay Order) भी पारित किया जा चुका है।

 स्थानीय सूत्रों के अनुसार, यह पूरा मामला एक पार्षद के दबाव और संबंधित इंजीनियर की भ्रष्ट मंशा से जुड़ा बताया जा रहा है। आरोप है कि नियमों, कानून और न्यायालय के आदेशों को ताक पर रखकर निर्माण कार्य इसलिए कराया जा रहा है ताकि बाद में जमीन अधिग्रहण, मुआवजा या अन्य मदों में बड़ा खेल किया जा सके। यदि यह सच है, तो यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं बल्कि न्यायपालिका की अवमानना का भी गंभीर मामला बनता है।


कुचलता नगर निगम इंदौर?


ट्रैफिक से कराहता शहर और विवादित निजी जमीन पर ‘भ्रष्ट सड़क’ का खेल


इंदौर।


एक ओर पूरा शहर जाम, गड्ढों और अव्यवस्थित ट्रैफिक से त्रस्त है, दूसरी ओर नगर निगम इंदौर की प्राथमिकताएं सवालों के घेरे में हैं। जिन मुख्य सड़कों पर रोज़ाना लाखों नागरिक जाम में फंसे रहते हैं, वहां सुधार के लिए न तो इच्छाशक्ति दिखती है और न ही ठोस योजना। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि जहां सड़क की न तो कोई जरूरत है, न कनेक्टिविटी—वहां निगम भ्रष्टाचार की मंशा से सड़क निर्माण पर आमादा हो गया है, वह भी न्यायालय के स्पष्ट स्थगन आदेश के बावजूद।

ताजा मामला जोन क्रमांक 10, खजराना स्थित हिना कॉलोनी के सर्वे नंबर 1127/1128 का है। यह भूमि निजी स्वामित्व की है और इस पर स्वामित्व को लेकर न्यायालय में विवाद लंबित है। इतना ही नहीं, माननीय न्यायालय द्वारा इस जमीन पर स्थगन आदेश (Stay Order) भी पारित किया जा चुका है। इसके बावजूद नगर निगम के जिम्मेदार अधिकारी आंख मूंदकर इस विवादित निजी भूमि पर सड़क निर्माण करवा रहे हैं।

सबसे गंभीर सवाल यह है कि जिस स्थान पर सड़क बनाई जा रही है, वहां न आगे कोई कनेक्टिविटी है, न आजू-बाजू की सड़कों से कोई व्यावहारिक जुड़ाव। यानी यह सड़क न तो किसी कॉलोनी को राहत देगी, न ट्रैफिक दबाव कम करेगी। फिर सवाल उठता है—आखिर यह सड़क किसके लिए और क्यों?

स्थानीय सूत्रों के अनुसार, यह पूरा मामला एक पार्षद के दबाव और संबंधित इंजीनियर की भ्रष्ट मंशा से जुड़ा बताया जा रहा है। आरोप है कि नियमों, कानून और न्यायालय के आदेशों को ताक पर रखकर निर्माण कार्य इसलिए कराया जा रहा है ताकि बाद में जमीन अधिग्रहण, मुआवजा या अन्य मदों में बड़ा खेल किया जा सके। यदि यह सच है, तो यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं बल्कि न्यायपालिका की अवमानना का भी गंभीर मामला बनता है।

इंदौर नगर निगम पहले से ही बदहाल सड़कों, अधूरे प्रोजेक्ट्स और अनियोजित विकास को लेकर आलोचनाओं में घिरा है। शहर की प्रमुख सड़कों पर आए दिन जाम लगता है, एंबुलेंस और स्कूल बसें फंसी रहती हैं, लेकिन निगम के अफसरों को इन समस्याओं से कोई सरोकार नहीं दिखता। इसके उलट, जहां सड़क की जरूरत ही नहीं, वहां नियमों को तोड़कर निर्माण किया जा रहा है।

यह मामला यह भी दर्शाता है कि नगर निगम में पारदर्शिता और जवाबदेही का कितना अभाव है। सवाल उठता है कि क्या नगर निगम कानून से ऊपर है? क्या न्यायालय के आदेश केवल आम नागरिकों के लिए होते हैं और सत्ता व अफसरशाही के लिए नहीं?

अब देखना यह है कि जिला प्रशासन, निगमायुक्त और महापौर इस गंभीर प्रकरण पर क्या कार्रवाई करते हैं। यदि समय रहते इस अवैध निर्माण को नहीं रोका गया, तो यह न सिर्फ सरकारी धन की बर्बादी होगी बल्कि इंदौर जैसे स्मार्ट सिटी के दावों पर भी करारा तमाचा साबित होगी।

शहर की जनता जवाब चाहती है—

कब सुधरेंगी नगर निगम की प्राथमिकताएं?

और कब तक कानून का मज़ाक उड़ता रहेगा?

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