"तलाकशुदा बेटी हर हाल में उस बेटी से बेहतर है, जिसकी तस्वीर पर फूल चढ़ाने पड़ें।"
हमने सड़कों पर, ट्रेनों में, चौक-चौराहों पर किन्नरों को देखा है। लेकिन आज समाज में एक और प्रकार के किन्नर पैदा हो गए हैं। भोपाली भाषा में इन्हें हिजड़ा कहा जाता है। यह शब्द लिखते हुए मुझे थोड़ा संकोच हो रहा है, क्योंकि पत्रकारिता की परंपरा में ऐसे शब्दों का प्रयोग उचित नहीं माना जाता। मैं किन्नर समाज से भी क्षमा चाहता हूं, क्योंकि किन्नर समाज कभी किसी के साथ अन्याय नहीं करता। मेरा यह शब्द उन दहेज-लोभी लोगों के लिए है, जो आलीशान घरों में रहते हैं, सभ्यता और संस्कार का मुखौटा पहनते हैं और स्वयं को बहुत बड़ा मर्द समझते हैं। मगर जब अपनी पत्नी के सम्मान, अधिकार और सुरक्षा की बात आती है, तब उनकी सारी मर्दानगी हवा हो जाती है।
शादी से पहले ऐसे लोगों की बातों में इतनी मिठास होती है कि लड़की के माता-पिता को लगता है मानो इससे अधिक सभ्य और संस्कारी परिवार संसार में कोई नहीं होगा। उनकी जुबान से शहद टपकता है, व्यवहार में विनम्रता दिखाई देती है और चेहरे पर संस्कारों का नकाब सजा रहता है।
लेकिन समय बीतते ही नकाब उतरने लगता है।
फिर शुरू होता है मांगों का सिलसिला।
कभी कार चाहिए।
कभी नकद रुपये चाहिए।
कभी महंगे उपहार चाहिए।
कभी नया मकान या व्यवसाय के लिए धन चाहिए।
और जब ये मांगें पूरी नहीं होतीं, तब सबसे पहले बेटी की मुस्कान छीनी जाती है। फिर उसका आत्मसम्मान, उसकी स्वतंत्रता और धीरे-धीरे उसकी जीने की इच्छा भी।
जब मां-बाप अपनी बेटी से फोन पर बात करते हैं तो वह अक्सर मुस्कुराकर कहती है—
"नहीं मां, सब ठीक है।"
लेकिन उस मुस्कान के पीछे कितने आंसू छिपे हैं, यह केवल वही जानती है।
वह अपने दुख इसलिए छिपाती है क्योंकि उसे अपने माता-पिता की चिंता होती है। उसे लगता है कि अगर उसने सच बता दिया तो उसके मां-बाप टूट जाएंगे।
लेकिन एक दिन ऐसा भी आता है जब वह भीतर से पूरी तरह टूट जाती है।
कभी वह आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाती है।
कभी उसकी मौत रहस्यमयी परिस्थितियों में हो जाती है।
और जब यह खबर उसके माता-पिता तक पहुंचती है, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक जाती है।
दहेज के लिए बेटियों को प्रताड़ित करने वाले केवल एक बेटी की जान नहीं लेते, वे पूरे परिवार की खुशियों का गला घोंट देते हैं। वे इंसानियत को शर्मसार कर देते हैं।
उन माता-पिता से पूछिए जिन्होंने अपनी जवान बेटी को खोया है।
कल तक वही बेटी थी जो पिता के घर लौटते ही दौड़कर दरवाजा खोलती थी।
वही बेटी जो रसोई से भागकर पिता के लिए पानी लाती थी।
वही बेटी जो अपने नन्हे हाथों से पिता के माथे का पसीना पोंछती थी।
वही बेटी जो पिता की गोद में बैठकर उनसे ढेर सारी बातें किया करती थी।
जब वह स्कूल जाती थी तो पिता उसका बस्ता अपने कंधे पर टांग लेते थे।
खेलते समय उसे जरा-सी चोट लग जाती थी तो मां-बाप का दिल रो पड़ता था।
कभी उसकी चोट पर फूंक मारते थे।
कभी उसके आंसू पोंछते थे।
कभी टॉफी देकर उसे चुप कराते थे।
क्योंकि वह केवल बेटी नहीं थी, मां-बाप के दिल का टुकड़ा थी।
लेकिन सोचिए, जब वही बेटी किसी बंद कमरे में रो रही होगी...
जब वह मदद के लिए पुकार रही होगी...
जब उसकी आंखों से आंसुओं की धार बह रही होगी...
जब उसे अपमान, तानों और अत्याचारों का सामना करना पड़ रहा होगा...
तब वह किसे याद करती होगी?
शायद अपने बाबूजी को...
शायद अपनी मां को...
शायद अपने उस घर को, जहां उसकी एक खरोंच पर पूरा परिवार परेशान हो जाता था।
लेकिन उस समय उसके जख्मों पर फूंक मारने वाला कोई नहीं होता।
उसके आंसू पोंछने वाला कोई नहीं होता।
उसे गले लगाकर चुप कराने वाला कोई नहीं होता।
और जब उसकी सांसें थम जाती हैं, तब ससुराल से एक फोन आता है—
"आपकी बेटी अब इस दुनिया में नहीं रही।"
बस, यहीं से एक मां की दुनिया उजड़ जाती है।
एक पिता की कमर टूट जाती है।
एक भाई का हौसला बिखर जाता है।
और एक घर हमेशा के लिए सूना हो जाता है।
भारत में आज भी दहेज से जुड़ी घटनाएं चिंता का विषय बनी हुई हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार देश में औसतन हर दिन लगभग 15 से 16 महिलाएं दहेज से जुड़े उत्पीड़न, हिंसा या संदिग्ध परिस्थितियों में अपनी जान गंवाती हैं। यह केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि हजारों बिखरे हुए परिवारों की दर्दनाक कहानियां हैं।
हाल ही में भोपाल की मॉडल एवं अभिनेत्री ट्विशा शर्मा की मृत्यु ने पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया। इस मामले में विभिन्न आरोप लगाए गए हैं और जांच जारी है। समाज को उम्मीद है कि सत्य सामने आएगा और न्याय होगा।
अंत में मैं हर मां-बाप से केवल इतना कहना चाहता हूं—
अपनी बेटी से रोज़ बात कीजिए।
उसकी आवाज़ सुनिए।
उसकी खामोशी को समझिए।
उसकी आंखों में छिपे दर्द को पढ़ने की कोशिश कीजिए।
यदि कभी आपको महसूस हो कि आपकी बेटी दुख में है, तो समाज की परवाह मत कीजिए।
लोग क्या कहेंगे, इसकी चिंता मत कीजिए।
उसे अपने घर वापस ले आइए।
क्योंकि टूटे हुए रिश्ते फिर जुड़ सकते हैं।
समाज की बातें कुछ दिनों में बंद हो जाती हैं।
लेकिन बेटी की तस्वीर पर चढ़े फूल कभी वापस नहीं उतरते।
याद रखिए—
दहेज के लालची रिश्तों से रिश्ता टूट जाए तो टूटने दीजिए, लेकिन किसी बेटी की सांस कभी मत टूटने दीजिए।
जान है तो जहान है।
तलाकशुदा बेटी हर हाल में उस बेटी से बेहतर है, जिसकी तस्वीर पर फूल चढ़ाने पड़ें।
🙏🙏🙏🙏🙏
मोहम्मद जावेद खान
संपादक, भोपाल मेट्रो न्यूज
9009626191




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