डाक्टर दीपक गोस्वामी
गांव से लेकर बड़े नगर तक अब एक ही डर है। रात को जब सब लोग आराम से सोते हैं, उसी समय कोई बिना दिखाई देने वाला हाथ आपके मोबाइल के माध्यम से आपकी मेहनत की कमाई पर डाका डाल रहा होता है। पढ़ा-लिखा हो या अनपढ़, धनवान हो या गरीब, अब कोई पूरी तरह सुरक्षित नहीं रह गया है।
इसकी शुरुआत उत्तराखंड में सामने आए मामलों से हुई। वहां की जालसाजी निरोधक पुलिस ने बताया कि ठग पहले कई दिनों तक अपने शिकार की गतिविधियों पर नजर रखते हैं। वे यह जान लेते हैं कि व्यक्ति कब सोता है, कब उठता है और कब अपना मोबाइल चार्जिंग पर लगाकर छोड़ देता है। फिर रात ग्यारह बजे से सुबह चार बजे के बीच, जब व्यक्ति गहरी नींद में होता है, उसी समय दूर बैठे अपराधी उसके मोबाइल पर नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास करते हैं।
चम्पावत में एक वरिष्ठ अधिकारी के नाम से उनके कर्मचारियों को संदेश भेजा गया कि अधिकारी का पुत्र अस्पताल में भर्ती है और तत्काल धन की आवश्यकता है। कर्मचारियों ने विश्वास करके पैसे भेज दिए। हल्द्वानी में एक व्यक्ति सुबह उठा तो देखा कि रातभर उसके मोबाइल पर अनेक गुप्त संख्याएं आई थीं और उसका बैंक खाता पूरी तरह खाली हो चुका था।
ऐसा ही मामला गुरुग्राम में राहुल पुरी के साथ हुआ। एक व्यक्ति ने स्वयं को बीमा कंपनी का अधिकारी बताते हुए कहा कि आपकी योजना की किस्त शेष है। उसने एक चौकोर सांकेतिक चित्र भेजा। पहला चित्र काम नहीं करने पर दूसरा भेजा गया। जैसे ही राहुल ने उसे जांचा, पहले दो हजार रुपये और फिर अट्ठानवे हजार रुपये उनके खाते से निकल गए। बाद में पता चला कि बीमा कंपनी को कोई भुगतान पहुंचा ही नहीं था।
गुरुग्राम के ही बास पदमका गांव के पवन कुमार के साथ और भी विचित्र घटना हुई। उन्होंने न कोई संदिग्ध कड़ी खोली, न किसी को गुप्त संख्या बताई, फिर भी उनका मोबाइल अपराधियों के नियंत्रण में चला गया। कुछ ही देर में उनके बैंक खाते से पहले पचास हजार और फिर छह हजार रुपये निकाल लिए गए। पवन का कहना था कि उस समय उनका मोबाइल उनकी जेब में ही था।
रायपुर में आशीष भाई देसाई के साथ हुई घटना और भी भयावह है। नया बिजली मीटर लगाने के नाम पर उन्हें तेरह रुपये जमा कराने के लिए एक कड़ी भेजी गई। उस पर बिजली विभाग का चिन्ह भी था, इसलिए उन्हें विश्वास हो गया। जैसे ही उन्होंने कड़ी खोली, उनका मोबाइल नियंत्रित हो गया और कुछ ही मिनटों में सात लाख दो हजार चार सौ बहत्तर रुपये उनके विभिन्न बैंक खातों से निकाल लिए गए।
भोपाल में लोक निर्माण विभाग के एक अधिकारी को संदेश के माध्यम से विवाह का निमंत्रण मिला। साथ में एक मोबाइल प्रोग्राम की फाइल भी थी। उन्होंने उसे खोल दिया। उसी दिन से उनके मोबाइल की कमान अपराधियों के हाथ में चली गई। वे छह महीने तक शांत बैठे रहे और जैसे ही वेतन, बोनस तथा भविष्य निधि की राशि खाते में आई, पूरी रकम एक ही रात में निकाल ली।
ये अकेली घटनाएं नहीं हैं। अब एक नया अपराधी नेटवर्क तेजी से सक्रिय हो चुका है। देश की जालसाजी रोकने वाली एजेंसियों ने इसकी चेतावनी दी है। ठग पहले किसी कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी का संदेश भेजने वाला खाता अपने नियंत्रण में लेते हैं। फिर उसी वास्तविक खाते से कर्मचारियों को संदेश भेजते हैं—"तुरंत भुगतान करना है, अभी कर दो।" कई बार अपना नंबर ही अधिकारी के नाम से सुरक्षित कर लेते हैं। कर्मचारी विश्वास करके धन भेज देता है और देखते ही देखते कंपनी लाखों या करोड़ों रुपये गंवा देती है।
मोबाइल का नया पत्र (सिम) बनवाने वाली ठगी भी तेजी से बढ़ रही है। अचानक आपका मोबाइल काम करना बंद कर देता है। आपको लगता है कि नेटवर्क की समस्या है, जबकि वास्तव में अपराधियों ने आपके नाम पर नया सिम सक्रिय कर लिया होता है। अब बैंक की सभी गुप्त संख्याएं और भुगतान संबंधी संदेश सीधे उनके पास पहुंचने लगते हैं।
सबसे खतरनाक तरीका है डर पैदा करके ठगी करना। अपराधी स्वयं को पुलिस अधिकारी, जांच एजेंसी या न्यायालय का अधिकारी बताते हैं। वीडियो कॉल पर सरकारी वर्दी और नकली दस्तावेज दिखाकर कहते हैं कि आपके नाम से अपराध हुआ है और गिरफ्तारी होने वाली है। फिर डराकर लाखों रुपये ऐंठ लेते हैं।
सूरत में तो पुलिस ने ऐसा पूरा गिरोह पकड़ा, जहां घरों से ही फर्जी बैंक खाते, नकली सिम और झूठी पहचान बनाकर करोड़ों रुपये की ठगी की जा रही थी।
सरकार भी इस चुनौती से निपटने का प्रयास कर रही है। संचार विभाग ने संदिग्ध नंबरों की पहचान करने के लिए विशेष व्यवस्था विकसित की है। १९३० साइबर सहायता सेवा चौबीसों घंटे कार्यरत है। लेकिन सबसे बड़ी चुनौती यह है कि जब तक अधिकांश लोग शिकायत करते हैं, तब तक धन कई खातों से होकर कहीं और पहुंच चुका होता है।
सबसे अधिक निशाना वे लोग बनते हैं जिन्हें डिजिटल व्यवस्था की पूरी जानकारी नहीं होती। जो सरकारी नाम देखकर तुरंत विश्वास कर लेते हैं, जो कड़ी और चौकोर सांकेतिक चित्र के खतरे को नहीं समझते और जिन्हें लगता है कि फोन करने वाला व्यक्ति सचमुच सरकारी अधिकारी ही होगा।
रामलाल काका, पवन कुमार, आशीष भाई और भोपाल के अधिकारी केवल उदाहरण हैं। प्रतिदिन देशभर में सैकड़ों परिवार अपनी मेहनत की कमाई गंवा रहे हैं। कहीं बेटी का विवाह रुक रहा है, कहीं इलाज अधूरा रह जाता है और कहीं वर्षों की जमा पूंजी एक रात में समाप्त हो जाती है।
इसलिए कुछ बातें जीवनभर याद रखें। कोई भी सरकारी विभाग संदेश भेजकर तेरह रुपये जमा कराने की कड़ी नहीं भेजता। कोई बैंक फोन पर गुप्त संख्या नहीं मांगता। कोई पुलिस अधिकारी वीडियो कॉल पर पैसे मांगकर मामला समाप्त नहीं करता और कोई प्रतिष्ठित कंपनी आधी रात को तत्काल भुगतान का आदेश नहीं देती।
रात को सोने से पहले अनावश्यक मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट का उपयोग बंद कर दें। बैंक और भुगतान संबंधी प्रोग्राम से पूरी तरह बाहर निकल जाएं। मोबाइल पर मजबूत ताला और दोहरी सुरक्षा अवश्य लगाएं। किसी भी अनजान कड़ी, चौकोर सांकेतिक चित्र या संदिग्ध प्रोग्राम को कभी न खोलें। यदि अचानक मोबाइल नेटवर्क बंद हो जाए तो तुरंत १९८ पर संपर्क करके अपना सिम बंद करवाएं और बैंक को तुरंत सूचना दें।
यदि ठगी हो जाए तो घबराएं नहीं और शर्म के कारण चुप भी न रहें। तुरंत १९३० पर शिकायत दर्ज कराएं, बैंक को सूचित करें और निकटतम थाने में लिखित शिकायत दें। आपकी एक शिकायत अनेक लोगों की मेहनत की कमाई बचा सकती है।
यह केवल धन की सुरक्षा का प्रश्न नहीं है, बल्कि पूरे परिवार के भविष्य की रक्षा का विषय है। अदृश्य चोर तभी तक शक्तिशाली हैं, जब तक हम अनजान हैं। जिस दिन गांव-गांव और घर-घर जागरूकता पहुंच जाएगी, उसी दिन इन अपराधियों का सबसे बड़ा हथियार समाप्त हो जाएगा।
अपने घर के बुजुर्गों, गांव के लोगों, दुकानदार भाइयों, बहनों और बच्चों को यह कहानी अवश्य सुनाइए। उन्हें बताइए कि मोबाइल में पूरी दुनिया बसती है, लेकिन उसी दुनिया में ठग भी छिपे बैठे हैं। सावधानी ही सुरक्षा है। जागरूकता ही बचाव है। आपकी मेहनत की कमाई, आपका सम्मान और आपके परिवार का भविष्य—सब आपकी सतर्कता पर निर्भर है।
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक
समन्वयक – आदर्श संस्कार शाला, भारत
देश के चर्चित लेखक, मोटिवेशनल स्पीकर, प्रशिक्षक एवं सामाजिक कार्यकर्ता
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