रक्षाबंधन को केवल भाई और बहन के बीच राखी बाँधने का पर्व मान लेना उसके व्यापक सांस्कृतिक अर्थ को सीमित कर देना है। यह भारतीय परंपरा में स्नेह, उत्तरदायित्व, विश्वास, मंगलकामना और परस्पर संरक्षण की भावना को स्मरण करने वाला पर्व है। आज इसका सबसे लोकप्रिय रूप भाई-बहन के संबंध से जुड़ा है, परंतु रक्षासूत्र की परंपरा इससे व्यापक है।
भारतीय चिंतन का विराट संदेश है—“एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति।” सत्य एक है, उसके अनुभव और अभिव्यक्ति के रूप अनेक हो सकते हैं। रक्षाबंधन इसी व्यापक भावभूमि पर संबंधों को केवल रक्त-संबंध नहीं, बल्कि विश्वास और उत्तरदायित्व के सूत्र से देखने का अवसर देता है।
“रक्षा” केवल बाहरी संकट से बचाने का नाम नहीं। रक्षा का अर्थ है—किसी व्यक्ति के सम्मान, स्वतंत्रता, जीवन, विश्वास और गरिमा के प्रति उत्तरदायी होना। इसलिए रक्षासूत्र वास्तव में एक नैतिक संकल्प का प्रतीक है। कलाई पर बँधा धागा स्वयं कोई चमत्कारी शक्ति उत्पन्न करता है—ऐसा वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है; लेकिन उसके साथ जुड़ा संकल्प मनुष्य के व्यवहार और संबंधों को प्रभावित कर सकता है।
लोकप्रिय रक्षाबंधन मंत्र—“येन बद्धो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबलः…”—आज राखी बाँधते समय व्यापक रूप से बोला जाता है और राजा बलि की कथा से जोड़ा जाता है। विभिन्न धार्मिक आख्यानों और लोकपरंपराओं में लक्ष्मी-बलि, इन्द्र-इन्द्राणी तथा कृष्ण-द्रौपदी से जुड़े प्रसंग भी मिलते हैं। इन्हें धार्मिक-सांस्कृतिक आख्यानों के रूप में समझना चाहिए; प्रत्येक को आधुनिक इतिहास की प्रमाणित घटना मानना आवश्यक नहीं है।
रक्षाबंधन का मनोवैज्ञानिक पक्ष अत्यंत महत्वपूर्ण है। मनुष्य संबंधों में जीने वाला सामाजिक प्राणी है। प्रियजन का स्नेह, स्पर्श, विश्वास और भावनात्मक निकटता सुरक्षा की अनुभूति को बढ़ा सकती है। आधुनिक विज्ञान में सामाजिक स्पर्श और ऑक्सीटोसिन जैसी जैविक प्रणालियों के बीच संबंधों पर शोध हुआ है, लेकिन यह कहना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं कि राखी बाँधने मात्र से निश्चित रूप से ऑक्सीटोसिन का स्राव बढ़ता है। परंपरा का सम्मान और वैज्ञानिक सत्यनिष्ठा—दोनों साथ चल सकते हैं।
इसी प्रकार कलाई पर राखी बाँधने को किसी विशिष्ट “नाड़ी” को सक्रिय करने वाली वैज्ञानिक चिकित्सा अथवा एक्यूप्रेशर उपचार कहना प्रमाणित नहीं है। कलाई में रक्तवाहिनियाँ और तंत्रिकाएँ अवश्य होती हैं, किंतु सामान्य राखी के दबाव को चिकित्सकीय उपचार के रूप में प्रस्तुत करने का पर्याप्त वैज्ञानिक आधार उपलब्ध नहीं है।
रक्षाबंधन का वास्तविक मनोवैज्ञानिक प्रभाव उसके संकल्प और संबंध में छिपा है। जब बहन भाई की कलाई पर राखी बाँधती है, तो वह केवल शारीरिक सुरक्षा की अपेक्षा नहीं रखती; वह विश्वास, सम्मान और साथ निभाने की भावना को पुनर्जीवित करती है। भाई का वचन भी केवल बहन की रक्षा तक सीमित नहीं होना चाहिए। उसमें उसकी शिक्षा, स्वतंत्रता, सम्मान, आत्मनिर्भरता और निर्णय लेने के अधिकार की रक्षा का भाव होना चाहिए।
और यह संबंध एकतरफा भी नहीं है। बहन भी भाई के सुख-दुःख, संघर्ष और जीवन-यात्रा में सहभागी है। आधुनिक दृष्टि से रक्षाबंधन का श्रेष्ठ अर्थ है—रक्षा पारस्परिक हो, सम्मान पारस्परिक हो और उत्तरदायित्व भी पारस्परिक हो।
इस पर्व का सामाजिक और आर्थिक पक्ष भी महत्वपूर्ण है। राखी, मिठाई, वस्त्र, उपहार, यात्रा और पारिवारिक मिलन से छोटे व्यापारियों, कारीगरों और सेवा क्षेत्र से जुड़े अनेक लोगों की आजीविका जुड़ती है। “नेग” भी विभिन्न क्षेत्रों और परिवारों में अलग-अलग रूपों में प्रचलित सामाजिक परंपरा है। इसे पूरे भारतीय इतिहास में एक समान “स्त्रीधन व्यवस्था” कहना तथ्यपरक नहीं होगा।
इतिहास में राखी अथवा रक्षासूत्र को जैविक भाई-बहन के संबंध से बाहर भाईचारे और संरक्षण के प्रतीक के रूप में स्वीकार किए जाने के अनेक आख्यान मिलते हैं। रानी कर्णावती द्वारा हुमायूँ को राखी भेजने की प्रसिद्ध कथा भारतीय जनमानस में अत्यंत लोकप्रिय है, लेकिन इसे निर्विवाद ऐतिहासिक तथ्य कहना उचित नहीं है। समकालीन प्रमाणों की कमी के कारण इसे लोकप्रिय ऐतिहासिक आख्यान के रूप में प्रस्तुत करना अधिक सावधान और सत्यपरक है।
रक्षाबंधन की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि यह रक्षा की अवधारणा को परिवार से समाज तक विस्तारित कर सकता है। यदि रक्षा का अर्थ किसी स्त्री की स्वतंत्रता सीमित करना नहीं, बल्कि उसके सम्मान और अधिकारों की रक्षा करना है, तो यही भावना बच्चों, वृद्धों, दिव्यांगों, कमजोर वर्गों और प्रकृति तक विस्तारित हो सकती है।
“वसुधैव कुटुम्बकम्” का व्यापक नैतिक अर्थ भी यही है कि मनुष्य अपनी संवेदना को केवल अपने परिवार तक सीमित न रखे। परिवार से समाज, समाज से राष्ट्र और राष्ट्र से समस्त मानवता तक करुणा और उत्तरदायित्व का विस्तार हो।
इस दृष्टि से रक्षासूत्र कोई जादुई धागा नहीं, बल्कि स्मृति और संकल्प का धागा है। वह हमें याद दिलाता है कि शक्ति का श्रेष्ठतम रूप संरक्षण है, अधिकार का श्रेष्ठतम रूप उत्तरदायित्व है और प्रेम का श्रेष्ठतम रूप कठिन समय में साथ खड़ा होना है।
रक्षाबंधन का अंतिम संदेश केवल यह नहीं कि “भाई बहन की रक्षा करेगा।” इसका श्रेष्ठ संदेश है—
मैं तुम्हें बाँध नहीं रहा,
मैं स्वयं को तुम्हारे प्रति अपने कर्तव्य से बाँध रहा हूँ।
मैं तुम्हारे जीवन पर अधिकार नहीं चाहता,
तुम्हारी गरिमा के सम्मान का संकल्प चाहता हूँ।
मैं केवल अपने परिवार की नहीं,
अपने समाज की भी रक्षा-चेतना जगाना चाहता हूँ।
कलाई पर बँधा सूत कुछ समय बाद टूट सकता है, लेकिन यदि उसके साथ बँधा संस्कार जीवन भर बना रहे, तो वही वास्तविक रक्षासूत्र है।
धागा कलाई पर बँधता है, संकल्प हृदय में;
राखी एक व्यक्ति को बाँधती है,
लेकिन उसका संदेश पूरे समाज को जोड़ सकता है।
यही बंधन प्रेम है।
यही बंधन उत्तरदायित्व है।
और यही बंधन मानवता की अखंड रक्षा का संस्कार है।
लेखक : डॉ. दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक | लेखक | मोटिवेशनल स्पीकर | प्रशिक्षक | सामाजिक कार्यकर्ता
समन्वयक – आदर्श संस्कार शाला, भारत




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