सात्विक, समदर्शी, निरलेप लोककल्याणकारी किसान संघ की राष्ट्रीय संपत्ति संरक्षित रखने के संकल्प की विजय

 सात्विक, समदर्शी, निरलेप लोककल्याणकारी किसान संघ की राष्ट्रीय संपत्ति संरक्षित रखने के संकल्प की विजय




 नीरज द्विवदी 9993949000 


महाकाल की नगरी उज्जैन में आगामी सिंहस्थ की तैयारियाँ भले पूरे वेग से चल रही हों, लेकिन इसी माहौल में किसानों की पीड़ा और उनकी जमीन के भविष्य को लेकर छिड़ी लड़ाई ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया। लाखों हेक्टेयर भूमि को लैंड पूलिंग के जरिए अधिग्रहित करने की विवादित योजना को लेकर जिस तरह किसान संगठनों, विशेषकर भारतीय किसान संघ, ने सात्विक— दृढ़—आंदोलन खड़ा किया, उसने अंततः प्रदेश सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। विरोध इतना तीव्र और व्यापक था कि मोहन सरकार को कुछ ही दिनों में पूरी योजना वापस लेने का निर्णय करना पड़ा।


महिला शक्ति का प्रचंड संघर्ष: क्षिप्रा तट से उठी वह लौ जिसने सरकार को झकझोरा


कुछ ही दिन पहले भारतीय किसान संघ की हजारों महिला पदाधिकारी माँ क्षिप्रा के तट पर एकत्र हुई थीं। वहाँ संपन्न हुआ सद्बुद्धि यज्ञ और दीपदान केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं था, बल्कि एक प्रतीक था—भूमि केवल मिट्टी नहीं, हमारी राष्ट्रीय धरोहर है; और उस धरोहर पर अन्याय का कोई भी प्रयोग सहन नहीं किया जाएगा। इस आयोजन ने पूरे प्रदेश में एक स्पष्ट संदेश भेजा कि किसान केवल खेतों में अन्न उगाने वाले लोग नहीं, बल्कि भूमि और समाज दोनों के रक्षक हैं।


अखिल भारतीय किसान संघ का हस्तक्षेप—नीति का नाश नहीं, विनाश रोकने का प्रयास


लैंड पूलिंग योजना के संभावित दुष्परिणामों को देखते हुए भारतीय किसान संघ के अखिल भारतीय पदाधिकारी सक्रिय हुए।

उन्होंने प्रदेश संगठन की दूरदर्शिता को समझते हुए सरकार को यह समझाया कि—


मानव भूमि का उत्पादन नहीं कर सकता, इसलिए उसका विनाश भी मानवाधिकार और पर्यावरण दोनों के खिलाफ है।


खेती योग्य भूमि पर “सीमेंट के जंगल” खड़े करने की नीति आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को अंधकार में धकेल देगी।


मास्टर प्लान की आड़ में कृषि भूमि को समाप्त करना, खाद्यान्न सुरक्षा से लेकर आर्थिक संतुलन तक हर स्तर पर हानिकारक है।


भारतीय किसान संघ इसका विरोध साल 2016 से लगातार कर रहा है। सात वर्षों से यह संघर्ष एक ही सत्य पर टिका रहा—

भूमि बचाओ, किसान बचाओ, समाज बचाओ।


प्रदेश भाजपा किसान मोर्चा रहा विफल — किसान असंतोष को समझने में फिर हुई चूक


इस पूरे घटनाक्रम में एक बार फिर यह सवाल उठ खड़ा हुआ कि जब किसान सड़क पर था, तब प्रदेश भाजपा किसान मोर्चा कहाँ था?

किसान मोर्चा सरकार की “हाँ” में “हाँ” मिलाते हुए किसानों के वास्तविक दर्द को सुनने में विफल रहा।कांग्रेस भी जमीन अधिग्रहण के मुद्दे पर शुरू से ही असंगठित और मौन रही। इसके उलट भारतीय किसान संघ—जिसपर वर्षों से भाजपा समर्थित होने के आरोप लगते रहे—किसान के साथ अंतिम क्षण तक खड़ा रहा। यही कारण है कि जमीन का मुद्दा किसी राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि किसान शक्ति बनाम सरकारी तंत्र के संघर्ष का प्रतीक बन गया।


अब तेज हुई प्रदेश के विकास प्राधिकरणों को भंग करने की मांग—किसान बोले, “विकास नहीं, विनाश प्राधिकरण हैं ये!”


लैंड पूलिंग योजना की वापसी के बाद किसान संघ का आक्रोश थमा नहीं, बल्कि एक कदम आगे बढ़ गया है।

किसान संघ ने स्पष्ट कहा है—विकास प्राधिकरण केवल नाम के ‘विकास’ के लिए हैं। यह प्राधिकरण किसानों की जमीनें बिना समुचित मुआवजा दिए ‘लैंड बैंक’ में जोड़ते जा रहे हैं। जिस किसान की जमीन ले ली जाए, वह पीढ़ियों तक मुआवजा पाने के लिए भटकता रहता है। अंत में यही भूमि भूमाफिया खरीद लेते हैं, और असली विकास जनता तक कभी पहुँचता ही नहीं। इसलिए अब प्रदेशभर में विकास प्राधिकरणों को भंग करने की मांग तेजी से उठने लगी है।



भारतीय किसान संघ ने अपनी सात्विक, समदर्शी और लोककल्याणकारी नीति पर चलते हुए यह सिद्ध कर दिया कि—

यदि संगठन निष्पक्ष हो, संकल्प अडिग हो और आंदोलन जनभावनाओं से जुड़ा हो, तो सरकार को भी नीतियों पर पुनर्विचार करना पड़ता है। लैंड पूलिंग योजना की वापसी केवल किसानों की जीत नहीं, बल्कि उस सोच की जीत है जो भूमि को केवल “संपत्ति” नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अमूल्य विरासत मानती है।

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