पहले 14.71 लाख की फीस, अब बिल्डिंग-हॉस्पिटल-फंड की तलाश2026!
कागजों से जमीन तक पहुंचने से पहले ही फंसा मेडिकल कॉलेज—पहले फीस भरने की जल्दबाजी, बाद में व्यवस्था जुटाने की नौबत?
ना ठोस प्लानिंग, ना पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर… फिर किस भरोसे शुरू हुआ मेडिकल कॉलेज का खेल?
रफी मोहम्मद शेख, इंदौर.
बिना खुद के हॉस्पिटल और बिल्डिंग के शुरू किया गया देवी अहिल्या यूनिवर्सिटी का झाबुआ मेडिकल कॉलेज का ड्रीम प्रोजेक्ट खटाई में नजर आ रहा है। मेडिकल कॉलेज के लिए फंड की भारी कमी के चलते यूनिवर्सिटी बिल्डिंग तक की जुगाड़ नहीं कर पाई है। पहले आरजीपीवी के इंजीनियरिंग कॉलेज में इसे शुरू कर 2026 से ही एडमिशन का दावा था लेकिन आरजीपीवी ने इसके लिए 60 करोड़ रुपए की क्षतिपूर्ति की मांग रख दी थी, जिसकी व्यवस्था यूनिवर्सिटी नहीं कर पाई। यहां तक कि शासन ने भी अब तक मदद का कोई वादा नहीं किया है। उधर यूनिवर्सिटी ने इस बिल्डिंग के भरोसे नेशनल मेडिकल काउंसिल नईदिल्ली में आवेदन जमा कर 14.71 लाख रूपए की फीस भी जमा कर दी है। अब पूरे मामले पर सवाल उठाए जा रहे हैं। वैसे भी इंजीनियरिंग कॉलेज की बिल्डिंग मेडिकल कॉलेज के हिसाब से फिट ही नहीं हैं।
देवी अहिल्या यूनिवर्सिटी में 25 साल से चल रहे मेडिकल कॉलेज की कवायद एक बार फिर अटक गई है। कुलगुरू प्रो. राकेश सिंघई के इस ड्रीम प्रोजेक्ट के लिए राज्य सरकार ने इसेंसिएलिटी सर्टिफिकेट (अनिवार्यता प्रमाण पत्र) जारी कर दिया है। इसके साथ ही यूनिवर्सिटी ने ताबड़तोड़ में नेशनल मेडिकल काउंसिल (एनएमसी) के पास आवेदन जमा कर दिया है। जानकारी के अनुसार इस आवेदन के साथ 14.71 लाख रुपए की फीस भी जमा की गई है। आवेदन में एमबीबीएस की 100 सीट पर अस्थाई संचालन और अनुमति मांगी गई है। अब इस पर सवाल उठना शुरू हो गए है कि कैसे बिना रणनीति के लिए कोर्स शुरू करने के लिए आवेदन कर दिया गया है।
अस्पताल के लिए जिला अस्पताल
वास्तव में यूनिवर्सिटी के पास न तो खुद की बिल्डिंग है और न ही हॉस्पिटल। यह पूरा प्रोजेक्ट करीब 1200 करोड़ का है। खुद का हॉस्पिटल नहीं होने पर झाबुआ का जिला अस्पताल कॉलेज के लिए शैक्षणिक अस्पताल के उपयोग में लाने की योजना है। इसमें अभी 250 बेड की व्यवस्था है कि जबकि मेडिकल कॉलेज के लिए 300 बेड का अस्पताल होना जरूरी है। यहां पर बेड बढ़ाने की योजना है। अभी तक यह नहीं बड़े हैं। यूनिवर्सिटी को आगे न पीछे खुद का अस्पताल शुरू करना होगा, जिसके लिए करोड़ों के फंड की जरूरत है।
जमीन आवंटित, बिल्डिंग नहीं
उधर यूनिवर्सिटी को मेडिकल कॉलेज के लिए झाबुआ प्रशासन ने 100 एकड़ जमीन का आवंटन भी कर दिया है। यह जमीन झाबुआ से पांच किलोमीटर दूर डूंगरा लालू क्षेत्र में है। इस जमीन पर निर्माण के लिए करीब 1200 करोड़ रुपए की जरूरत है। यूनिवर्सिटी के पास इसका फंड नहीं है। अगर इस फंड की व्यवस्था हो जाए तो भी यहां पर बिल्डिंग के निर्माण में कम से कम दो-तीन साल का समय भी लगने की उम्मीद है। फिर यहां से जिला अस्पताल तक आने-जाने के लिए नई व्यवस्थाएं करना होगी।
खुद इंजीनियरिंग कॉलेज शिफ्ट हो गया
इस कारण यूनिवर्सिटी ने इंदौर रोड स्थित अबुल कलाम आजाद आरजीपीवी इंजीनियरिंग कॉलेज (यूआईटी) की नई बिल्डिंग में संचालन करना तय किया था, जो उस समय खाली थी। 2025 तक झाबुआ का इंजीनियरिंग कॉलेज बिल्डिंग नहीं होने से पोलिटेक्निक कॉलेज के चार कमरों में संचालित होता था। जैसे ही मेडिकल कॉलेज की यह कवायद शुरू हुई कॉलेज अपनी खुद की नई बिल्डिंग में शिफ्ट हो गया। अभी कॉलेज में कम्प्यूटर साइंस और मैकेनिकल की दो ब्रांच चलाई जाती है। भविष्य में यहां पर नई ब्रांच भी शुरू करने की योजना है। 2015 से शुरू हुआ झाबुआ का इंजीनियरिंग कॉलेज पिछले 10 साल से बिल्डिंग नहीं होने से एक भी नया कोर्स या ब्रांच शुरू नहीं कर पाया है। वहां के क्षेत्रीय नेताओँ और छात्र संगठनों ने भी नई बिल्डिंग को मेडिकल कॉलेज को देने का विरोध किया है।
आखिर 60 करोड़ कहां से लाए
यूनिवर्सिटी ने जब इस कॉलेज के संचालनकर्ता भोपाल की आरजीपीवी यूनिवर्सिटी को बिल्डिंग का प्रस्ताव भेजा तो उन्होंने उपयोग के बदले 60 करोड़ रुपए की भारी-भरकम राशि क्षतिपूर्ति के रूप में देने की मांग रख दी। यूनिवर्सिटी ने पहले तो इसे देने की हां कर दी लेकिन बाद में तमाम कोशिशें की लेकिन इस रकम की व्यवस्था नहीं हो पाई है। शासन को भी इस राशि को माफ करने के लिए पत्र भी भेजे गए लेकिन अब तक कोई सकारात्मक जवाब नहीं आया है। इधर इस साल की नीट का काउंसलिंग भी शुरू हो चुकी है यानी अब इस सत्र में इसके शुरू होने की संभावना नहीं है।
झाबुआ क्यों शिफ्ट हुआ प्रोजेक्ट
इंदौर के छोटा बांगड़दा में 2001 से मेडिकल कॉलेज का प्रोजेक्ट जमीन की कमी के कारण अटका था। इंदौर में यूनिवर्सिटी के पास पहले 50 एकड़ जमीन थी, जो अब घटकर मात्र 12 एकड़ रह गई है। बाकी जमीन प्रशासन ने कॉलेज शुरू नहीं होने से वापस ले ली। वर्तमान जमीन मेडिकल कॉलेज के मानकों यानी 25 एकड़े के हिसाब से काफी कम है। एमबीबीएस के बाद बीडीएस, आयुर्वेदिक और होम्योपैथी के कोर्स भी शुरू करने की योजना है।
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मेडिकल कॉलेज के लिए फिट नहीं इंजीनियरिंग कॉलेज
- झाबुआ में इंजीनियरिंग कॉलेज की बिल्डिंग जी+3 है।
- इसमें सबकुछ मिलाकर 70 कमरे है, जिसमें दो वर्तमान में दो ब्रांच में 16 क्लासरूम और 16 लेब का उपयोग होता है। साथ ही प्रिंसिपल से लेकर ऑफिस तक के कमरे भी उपयोग में है।
- इसके अलावा सेमिनार हॉल, बोर्ड रूम, ऑफिस, गर्ल्स और बॉयज हॉस्टल भी उपलब्ध है।
- जमीन कुल 35.66 एकड़ है, जिसमें मुख्य बिल्डिंग और दो हॉस्टल है।
- बिल्डिंग इंजीनियरिंग के हिसाब से बनाई गई है, जिसमें मैकेनिकल, ड्राइंग, कम्प्यूटर की लेब बनी हुई है। यह मेडिकल के लिए फिट ही नहीं है।
- एक साथ इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज की पढ़ाई में समस्या भी हो सकती है।
- इंजीनियरिंग के नए कोर्स शुरू होते ही बिल्डिंग में जगह ही नहीं बचेगी।
- जमीन पर एक पेंच यह भी है यह जमीन डीटीई ने खरीदी थी और 3 हेक्टेयर की जमीन आरजीपीवी ने ली थी।
- बिल्डिंग पहाड़ी पर बनी हुई है और बरसात में बाकी स्थान पर पानी भर जाता है।
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मेडिकल कॉलेज के लिए बनी कमेटी के सदस्य डॉ. राजेश शर्मा और डॉ. सखाराम मुझाल्दा के मुताबिक शासन को 60 करोड़ की राशि को माफ करने के लिए पत्र भेजा गया है लेकिन अब तक कोई जवाब नहीं आया है।
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यूआईटी कॉलेज झाबुआ के प्रिंसिपल उमेश बनोधा ने बताया कि उनके पास अभी दो कोर्स है और आधी से ज्यादा बिल्डिंग का उपयोग हो रहा है। वही भविष्य में नए कोर्सेस की कोशिश की जा रही है। इसके बाद पूरी बिल्डिंग का उपयोग होगा।




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