मंच सजा, कैमरे तैयार रहे और प्रेस कॉन्फ्रेंस भी हो गई… मगर सवाल यह कि जब सामने पत्रकार ही नहीं थे, तो प्रेस कॉन्फ्रेंस किसके लिए थी*? 🤔
*जोन-3 की ‘प्रेस कॉन्फ्रेंस’ पर बड़ा सवाल: सामने प्रेस ही नहीं थी*!
📱 *पत्रकार नदारद, पुलिसकर्मी मोबाइल से खुद ही रिकॉर्डिंग करते नजर आए—आखिर किसके लिए हुई प्रेस वार्ता*?
*पुलिस-मीडिया संवाद के *दावों की खुली पोल*?
*प्रशंसा के लिए मीडिया* *चाहिए, तो सवालों के मीडिया *से दूरी क्यों*?
इंदौर।पुलिस और मीडिया के बीच बेहतर समन्वय और संवाद के दावे भले ही लगातार किए जाते हों, लेकिन जोन-3 के डीसीपी अभिषेक रंजन कथित प्रेस वार्ता ने इन दावों पर ही सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। चर्चा है कि प्रेस वार्ता के दौरान मौके पर पत्रकारों और मीडिया कैमरों की मौजूदगी बेहद कम या नजर नहीं आई। इतना ही नहीं, पुलिसकर्मियों द्वारा अपने मोबाइल फोन से ही पूरी वार्ता की रिकॉर्डिंग किए जाने की बात भी सामने आई है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—
जब सामने पत्रकार ही नहीं थे, तो फिर इसे ‘प्रेस कॉन्फ्रेंस’ क्यों कहा गया?
क्या यह वास्तव में मीडिया से संवाद था या फिर पुलिस की कार्रवाई और उपलब्धियों को रिकॉर्ड करने की एक औपचारिक कवायद?
मीडिया का काम सिर्फ पुलिस की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाना नहीं है। मीडिया का असली दायित्व सवाल पूछना भी है। पुलिस किसी कार्रवाई को लेकर जानकारी देती है तो पत्रकारों का अधिकार है कि वे कार्रवाई की वजह, प्रक्रिया, कानूनी पहलू और उसके परिणाम को लेकर सवाल करें।
🔥 सवाल सीधा है—क्या जोन-3 में सवाल पूछने वाली प्रेस ही नहीं थी, या प्रेस तक सूचना ही नहीं पहुंची?
यदि पत्रकारों को पर्याप्त सूचना दी गई थी तो उनकी मौजूदगी क्यों नहीं रही?
और यदि सूचना नहीं दी गई थी तो प्रेस वार्ता आयोजित करने का औचित्य क्या था?
मामला केवल पत्रकारों की संख्या का नहीं है। मामला पुलिस और मीडिया के बीच संवाद की विश्वसनीयता का है।
डीसीपी की बाइट को लेकर क्राइम रिपोर्टरों में नाराजगी!
बाइट मांगने पर समय नहीं देने के आरोप, विरोध में बहिष्कार की बात आई सामने
इंदौर में डीसीपी स्तर के अधिकारी की बाइट को लेकर क्राइम रिपोर्टरों में नाराजगी की चर्चाएं सामने आ रही हैं। बताया जा रहा है कि क्राइम रिपोर्टरों द्वारा खबरों के सिलसिले में डीसीपी साहब से बाइट मांगे जाने पर उन्हें पर्याप्त समय नहीं दिया जाता था।
सूत्रों के मुताबिक, इसी रवैये को लेकर कुछ क्राइम रिपोर्टरों में असंतोष बढ़ा और विरोध स्वरूप बहिष्कार की बात सामने आई है।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या पुलिस और मीडिया के बीच संवाद की दूरी बढ़ रही है? अगर पत्रकार खबरों के लिए पुलिस अधिकारियों का पक्ष जानना चाहें और उन्हें समय ही न मिले, तो निष्पक्ष खबरों में अधिकारी का पक्ष किस तरह शामिल होगा?
फिलहाल बहिष्कार की चर्चाओं ने पुलिस महकमे और क्राइम रिपोर्टिंग के बीच संवाद व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि, पूरे मामले में डीसीपी स्तर से आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आना बाकी है
आईपीएस अधिकारी का पद जितना बड़ा होता है, उसकी जवाबदेही भी उतनी ही बड़ी होती है। पुलिस की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने के लिए मीडिया की जरूरत है, तो मीडिया के सवालों का सामना करने के लिए भी वही दरवाजा खुला रहना चाहिए।
‘वाहवाही’ के वक्त मीडिया चाहिए तो ‘सवाल’ के वक्त भी मीडिया से संवाद करना होगा!
मीडिया पुलिस का विरोधी नहीं है। पत्रकार का काम सवाल पूछना है और अधिकारी का काम तथ्यों के साथ जवाब देना। सवाल-जवाब से बचना नहीं, बल्कि सवालों का सामना करना ही पारदर्शी व्यवस्था की पहचान है।
इंदौर पुलिस कमिश्नर संतोष कुमार सिंह की ओर से पुलिस और जनता के बीच विश्वास मजबूत करने तथा बेहतर संवाद पर जोर दिए जाने की बात कही जाती रही है। ऐसे में यदि पुलिस और मीडिया के बीच ही संवाद कमजोर दिखाई देता है, तो यह स्थिति निश्चित रूप से चिंता का विषय है।
⚠️ पुलिस कमिश्नर को लेना चाहिए संज्ञान
इस पूरे मामले में पुलिस कमिश्नर को संज्ञान लेकर यह स्पष्ट करना चाहिए कि जोन-3 की प्रेस वार्ता में पत्रकारों की मौजूदगी इतनी कम क्यों रही? मीडिया को सूचना कैसे और कब दी गई? और यदि प्रेस ही मौजूद नहीं थी, तो प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित करने का उद्देश्य क्या था?
क्योंकि—
पुलिस कार्रवाई करेगी तो सवाल होंगे…
सवाल होंगे तो जवाब भी देने होंगे…
और जवाबदेही से ही लोकतंत्र मजबूत होगा!
प्रशंसा के समय मीडिया चाहिए, तो सवालों के समय भी मीडिया से संवाद करना पड़ेगा।
क्योंकि प्रेस कॉन्फ्रेंस का मतलब सिर्फ कैमरे में रिकॉर्डिंग नहीं, बल्कि पत्रकारों के सवाल और अधिकारियों के जवाब भी होते हैं।
इंदौर के Zone 3 के डीसीपी अभिषेक रंजन की प्रेस वार्ता इस समय चर्चा का विषय है, जब अभिषेक रंजन ने मीडिया के सवालों से दूरी बनाने की कोशिश की तो जागरूक मीडिया ने उनसे ही दूरी बना ली, अब उनकी एक प्रेस वार्ता का फोटो सोशल मीडिया पर चर्चा में है जिसमें वो बिना किसी मीडिया चैनल के माइक के प्रेस वार्ता करते दिख रहे है, फर्क साफ है, सवाल पूछने पर प्रतिबंध लगेगा तो आपके जवाब भी नहीं दिखेंगे
कोइ भी अधिकारी मीडिया के साथियों के साथ इस तरह का व्यवहार करता है तो इंदौर प्रेस क्लब ऐसे व्यवहार की निंदा करता है , एवं साथियों के साथ मजबूती के साथ खड़ा रहेगा
Deepak kardam
अध्यक्ष
इंदौर प्रेस क्लब
एवं टीम




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