इंदौर के ‘प्रोटोकॉल’ के पर्याय रहे एक जिंदादिल अफसर की विदाई
इंदौर।कुछ अधिकारी अपनी कुर्सी, पद और अधिकार से पहचाने जाते हैं… लेकिन कुछ अधिकारी ऐसे होते हैं, जिनकी पहचान उनके पद से कहीं आगे निकल जाती है। उनकी पहचान उनके काम, व्यवहार, अनुभव और उन अनगिनत लोगों की यादों में बस जाती है, जिनसे वे अपने सेवाकाल में जुड़े होते हैं।
सेवानिवृत्त अपर कलेक्टर श्री बृजभूषण सिंह (बी.बी.एस.) तोमर उन्हीं चुनिंदा अधिकारियों में से एक थे।
शुक्रवार शाम उनके निधन का समाचार इंदौर के प्रशासनिक, सामाजिक और राजनीतिक हलकों के लिए बेहद दुखद रहा। करीब दो माह से उपचाररत श्री तोमर ने लंबी शासकीय सेवा के बाद दुनिया को अलविदा कह दिया। उनके जाने से सिर्फ एक परिवार ने अपना सदस्य नहीं खोया, बल्कि इंदौर ने भी ऐसा अधिकारी खो दिया, जिसकी मौजूदगी शहर की प्रशासनिक व्यवस्था की एक पहचान बन चुकी थी।
करीब 37 साल की सेवा, 33 साल इंदौर के नाम
श्री बी.बी.एस. तोमर ने करीब 37 वर्ष की शासकीय सेवा की। इनमें लगभग 33 वर्ष इंदौर में बीते। किसी अधिकारी के जीवन का इतना लंबा समय एक ही शहर की प्रशासनिक व्यवस्था के साथ जुड़ा होना अपने आप में विशेष बात है।
लेकिन तोमर की खासियत सिर्फ यह नहीं थी कि उन्होंने लंबे समय तक सेवा की। उनकी खासियत यह थी कि उन्होंने जिस जिम्मेदारी को संभाला, उसमें अपनी अलग पहचान बनाई।
इंदौर में अगर किसी एक नाम के साथ वर्षों तक प्रोटोकॉल व्यवस्था को जोड़ा गया, तो वह नाम था—बी.बी.एस. तोमर।
कलेक्ट्रेट की प्रोटोकॉल शाखा में उनकी भूमिका इतनी महत्वपूर्ण रही कि लंबे समय तक उनके बिना उस व्यवस्था की कल्पना करना भी मुश्किल माना जाता था।
बड़े अधिकारियों के दौरे हों, जनप्रतिनिधियों के कार्यक्रम हों, महत्वपूर्ण अतिथियों का आगमन हो या प्रशासनिक स्तर के बड़े आयोजन—प्रोटोकॉल की जिम्मेदारियां बेहद सावधानी, समयबद्धता और अनुभव मांगती हैं। श्री तोमर ने वर्षों तक इन जिम्मेदारियों को पूरी मुस्तैदी से निभाया।
एक सफर जो सहायक अधीक्षक से अपर कलेक्टर तक पहुंचा
तत्कालीन कलेक्टर अजीत सिंह जोगी के कार्यकाल में उनकी पहली पोस्टिंग इंदौर कलेक्ट्रेट में हुई थी। उन्होंने सहायक अधीक्षक भू-अभिलेख के रूप में अपनी प्रशासनिक यात्रा शुरू की।
धीरे-धीरे जिम्मेदारियां बढ़ती गईं और अनुभव के साथ उनका प्रशासनिक कद भी बढ़ता गया। आगे चलकर उन्होंने अपर कलेक्टर के महत्वपूर्ण पद तक जिम्मेदारी संभाली।
अपने सेवाकाल में उन्होंने करीब एक दर्जन कलेक्टरों के साथ काम किया। प्रशासन में लगातार बदलते चेहरे, बदलती व्यवस्थाएं और बदलते दौर को उन्होंने बहुत करीब से देखा।
ग्वालियर में एसडीएम की जिम्मेदारी संभाली तो इंदौर में मंडी सचिव सहित कई महत्वपूर्ण पदों पर काम किया। प्रशासनिक सेवा के अलग-अलग अनुभवों ने उनके व्यक्तित्व को और समृद्ध किया।
कोरोना के कठिन दौर में भी पीछे नहीं हटे
श्री तोमर के सेवाकाल का एक महत्वपूर्ण अध्याय कोरोना महामारी का कठिन दौर भी रहा। जब प्रशासन के सामने अभूतपूर्व चुनौतियां थीं, तब उन्होंने एडीएम का दायित्व संभालते हुए अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन किया।
वह दौर ऐसा था, जब प्रशासनिक अधिकारियों के लिए हर दिन नई चुनौती लेकर आता था। संकट, दबाव और अनिश्चितता के बीच व्यवस्था को संभालना आसान नहीं था। लेकिन श्री तोमर ने उस कठिन समय में भी अपनी जिम्मेदारी को गंभीरता से निभाया।
अफसर सख्त… लेकिन दिल बेहद साफ
प्रशासनिक गलियारों में श्री तोमर की छवि एक अनुभवी और सख्त अधिकारी की रही। काम के मामले में वे अनुशासन और जिम्मेदारी को लेकर किसी तरह का समझौता पसंद नहीं करते थे।
लेकिन जो लोग उनके करीब रहे, वे उनकी दूसरी तस्वीर जानते थे।
सख्त अफसर के पीछे एक बेहद सहज, मिलनसार और जिंदादिल इंसान था।
मित्रों और करीबियों के बीच वे प्यार से ‘मुन्ना तोमर’ के नाम से जाने जाते थे।
उनकी बातचीत में अपनापन था। संबंधों को निभाने की उनकी अपनी शैली थी। यही वजह रही कि प्रशासनिक दायरे से बाहर भी उनके मित्रों और परिचितों का एक बड़ा संसार था।
पूर्व विधायक अश्विन जोशी सहित शहर के अनेक सामाजिक और राजनीतिक लोगों से उनके आत्मीय संबंध रहे। रतन अग्रवाल से भी उनकी गहरी मित्रता रही।
पद पर रहते हुए उन्होंने अनेक लोगों से मुलाकात की, लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद भी उनके रिश्ते केवल पद तक सीमित नहीं रहे। यही किसी अधिकारी की असली कमाई होती है।
इंदौर से रिश्ता सिर्फ नौकरी का नहीं था
श्री बी.बी.एस. तोमर का इंदौर से रिश्ता सिर्फ उनकी नौकरी तक सीमित नहीं था।
उनके पिता नृपालसिंह तोमर भी इंदौर में टीआई और सीएसपी के रूप में सेवाएं दे चुके थे। यानी तोमर परिवार का इंदौर से जुड़ाव पुराना और गहरा था।
श्री तोमर ने भी अपने जीवन का बड़ा हिस्सा इसी शहर को दिया।
होलकर कॉलेज से शिक्षा प्राप्त करने के बाद उनके जीवन की एक बड़ी यात्रा इंदौर से जुड़ गई। नौकरी, प्रशासन, मित्रता और पारिवारिक स्मृतियों—हर स्तर पर इंदौर उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा रहा।
2021 में सेवानिवृत्ति… लेकिन पहचान कभी रिटायर नहीं हुई
अक्टूबर 2021 में श्री तोमर शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त हुए।
आमतौर पर सेवानिवृत्ति के बाद किसी अधिकारी की सक्रिय प्रशासनिक भूमिका समाप्त हो जाती है। लेकिन कुछ लोगों की पहचान किसी पद की मोहताज नहीं होती।
बी.बी.एस. तोमर भी उन्हीं लोगों में थे।
वे पद से रिटायर हुए थे, लेकिन इंदौर की प्रशासनिक स्मृतियों से कभी रिटायर नहीं हुए।
कलेक्ट्रेट में काम करने वाले पुराने कर्मचारियों से लेकर अधिकारियों और शहर के सामाजिक लोगों तक, अनेक लोगों के पास उनसे जुड़ी अपनी-अपनी यादें हैं।
किसी को उनकी सख्त कार्यशैली याद आएगी…
किसी को उनकी बेबाक बातचीत…
किसी को उनका जिंदादिल अंदाज…
और किसी को वह दौर याद आएगा, जब प्रोटोकॉल की जिम्मेदारी का मतलब ही बी.बी.एस. तोमर हुआ करता था।
आज एक कुर्सी खाली है… लेकिन यादें भरी हैं
उनके निधन के बाद शायद कलेक्ट्रेट की वही इमारत रहेगी। वही गलियां रहेंगी। वही प्रोटोकॉल शाखा रहेगी। अधिकारी बदलेंगे, कर्मचारी बदलेंगे और समय आगे बढ़ता रहेगा।
लेकिन कुछ नाम समय के साथ मिटते नहीं।
बी.बी.एस. तोमर भी ऐसा ही एक नाम हैं।
उनके जाने से एक आवाज खामोश हो गई। एक अनुभवी हाथ हमेशा के लिए रुक गया। एक ऐसा इंसान चला गया, जिसने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा इंदौर की प्रशासनिक व्यवस्था को दिया।
किसी व्यक्ति का असली मूल्य उसके पद से नहीं, बल्कि उसके जाने के बाद पीछे छूटने वाली यादों से पता चलता है।
और बी.बी.एस. तोमर की यादें बहुत लंबी हैं।
एक अधिकारी चला गया…
एक जिंदादिल इंसान चला गया…
इंदौर की प्रशासनिक दुनिया का एक दौर चला गया।
लेकिन उनकी कर्मठता, उनकी कार्यशैली और उनसे जुड़े लोगों की स्मृतियां आने वाली पीढ़ियों को भी उस दौर की कहानी सुनाती रहेंगी।
कलेक्ट्रेट की गलियों में शायद अब उनका कदमों की आहट सुनाई नहीं देगी…
प्रोटोकॉल की जिम्मेदारियों के बीच उनका जाना-पहचाना अंदाज नजर नहीं आएगा…
मगर जिन लोगों ने उन्हें करीब से देखा, उनके लिए बी.बी.एस. तोमर हमेशा ‘मुन्ना तोमर’ ही रहेंगे।
आज इंदौर अपने उस बेटे को नम आंखों से विदाई दे रहा है, जिसने अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा इस शहर की सेवा में लगा दिया।
विनम्र श्रद्धांजलि
ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करें और शोकाकुल परिवार, मित्रों एवं शुभचिंतकों को इस अपार दुःख को सहने की शक्ति दें।
बी.बी.एस. तोमर को शत्-शत् नमन।
— वाघेला एक्सप्रेस परिवार





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